Most of us have heard of Steve Jobs, CEO of Apple and Pixar. Steve Jobs’ story has been an inspiration for all of us in our startup journey. Even today, it is one of the most loved speeches by entrepreneurs, students and almost anyone who needs a little inspiration once in a while. He talks about 3 short stories from his life and how it all finally came together during his time in Apple.
Until now, millions of Hindi readers in India could not be injected with the “Stay Hungry and Stay Foolish” virus! That changed when Medha and a bunch of enthusiastic contributors completed the Hindi translation of this speech on Dubzer. We all had a great time doing it. Initially it felt like a word game, to polish up our rusted Hindi, but as we saw more lines being completed, we soon realized that the “game” actually produced something creative and useful.
It’s amazing what a small crowd can achieve! And as more people are reading and sharing it, the translation is getting better!
We look forward to an enthusiastic response from you – to help spread the word, and to spot improvements and errors.
To edit any line or word in the article just click here and drag the slider to the appropriate line: http://www.dubzer.com/read?a=1036
Your changes will be instantly reflected on Dubzer.
Here is the crowd-created version 1.0 of the Hindi Translation. You can also read it directly on Dubzer.com:
स्टीव जोब्स, एप्पल कंप्यूटर और पिक्सार एनिमेशन स्टूडियो के सी.ई.ओ., ने 12 जून, 2005 मे स्टेन्फर्ड मे जो भाषण दिया था, उसका यह मूलग्रन्थ है.
मै आज आप लोगों के साथ, दुनिया के सर्वश्रेष्थ विश्वविद्यालय के दिक्षांत समारोह मे शामिल हूँ. यह मेरे लिये गर्व की बात है.मैंने कॉलेज पास नहीं किया।सच तो यह की ग्रैजूएशन के सबसे करीब मै आज आया हु | आज मैं तुम्हें अपने जीवन से तीन कहानियाँ बताना चाहता हूँ. बस्स. कोई बड़ी बात नहीं. सिर्फ तीन कहानियाँ.
पहली कहानी ज़िन्दगी की छोटी छोटी घटनाये जोडने और समझने के बारे मे है.
मैंने पहले ६ महीनों के बाद रीड कॉलेज छोड़ दिया, लेकिन फिर भी कॉलेज मे पड़ा रहा और १८ महीनो तक, जिसके बाद मैंने सचमुच ही छोड़ दिया.मैंने कॉलेज क्यों छोडा?
इसकी शुरूआत मेरे जन्म से पहले हुई थी.मेरी जैविक माँ एक अविवाहित युवा कॉलेज छात्रा थी, और उसने मुझे अंगीकरण के लिये दे दिया.वह यह बहुत चाहती थी कि मुझे पढे लिखे लोग गोद लें. इसी लिये एक वकील व उस्की पत्नी का मुझे गोद लेना तय हो गया.चु॑कि जब मेरा जन्म हुआ, उस परिवार ने ऐन वक्त पर ठुकरा दिया क्योंकि उन्होने सोचा था कि बेटी होगी !बस तो मेरे माता पिता को, जो उस समय प्रतीक्षा सूची में थे, देर रात के बीच एक फोन आया: “न जाने कैसे, हमे लड़का हुआ है. आप उसे गोद लेना चाहते हैं?” उन्होंने कहा: “बिलकुल!” मेरे जैविक माँ को बाद में पता चला कि मेरी माँ कॉलेज कभी नहीं गई थी, और नाकि मेरे पिता स्कूल भी नहीं गए थे !उसने अंतिम गोद लेने के कागजात पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. वह केवल कुछ ही महीने बाद मान गयी जब मेरे माता पिता ने वादा किया कि मुझे किसी दिन महाविद्यालय भेजा जाएगा.
और आखिर 17 साल बाद, मैं कॉलेज मे पढने गया. लेकिन मैंने अनजाने मे एक ऐसा कॉलेज चुना जो स्तान्फोर्ड जितना मेहेंगा था, जिसकी फीस भरने मे मेरे वेतनभोगी वर्गीय माता पिता की साडी बचत निकल गई. छह महीने बाद, मुझे इसमें कुछ मूल्य नहीं दिखा.जिंदिगी मे मुझे क्या करना है इसका मुझे बिल्कुम अंदाजा नहीं था. उसके ऊपर मुझे यह भी मालूम नहीं था की ये कॉलेज की शिक्षा किस तरह इस समस्या का हल निकलने मे मदद कर सकती है.और इधर मैं अपने माता-पिता की जिंदिगी भार की बचत खर्च कर रहा था.मैंने, इस विश्वास और भरोसे पर की जिंदिगी सब संभल लेगी, कॉलेज छोड़ दिया. उस समय मे अपने निर्णय से काफी डरा हुआ था, पर आज सोचता हु तोह वोह मेरे जिंदिगी का सबसे अच्छा निर्णय था. मिनट मैं बाहर गिरा दिया मैं आवश्यक नहीं है कि मुझे दिलचस्पी थी कक्षाएं लेने रोक सकता है, और जो कि दिलचस्प देखा पर छोड़ने के लिए शुरू.
सब कुछ इतना रूमानी नहीं था.मेरे पास हास्टल का कमरा नहीं था तो मैं एक दोस्त के कमरे में फर्श पे सोता था. मैं 5 ¢ कमाने के लिए कोक बोतलें वापस करने का काम करता था, और उस पैसे से खाना खरीदता था, और पुरे सप्ताह मे एक अच्छा भोजन केरने के लिए मैं हर रविवार रात को हरे कृष्ण मंदिर 7 मील चल कर जाता था. मुझे यह सब अच्छा लगता था.और जो भी मैंने अपनी जिज्ञासा और दिल कि बात सुन कर किया और पाया, वह सब बाद में मेरे लिए अमूल्य साबित हुआ.मैं तुम्हें एक उदाहरण दे देता हुँ:
उस समय रीड कॉलेज में शायद देश का सबसे अच्छा कलिग्रफी अनुदेश उपलब्ध था. परिसर के हर पोस्टर, हर दराज पर प्रत्येक लेबल पर खूबसूरती से कलिग्रफी की गई थी.क्योंकि मैंने कॉलेज छोड़ दिया था और मैं सामान्य विषयों के क्लास नहीं ले सकता था, इसलिए मैंने कलिग्रफी सीखने का फैसला किया.मैंने सेरिफ़ और सान सेरिफ़ अक्शर रचना और अलग अलग अक्शरो के बीच दुरी की मात्रा के बारे में सीखा, मैने सीखा कैसे महान अक्शर रचना महान बनाती है. वह सुंदर और ऐतिहासिक था, कलात्मकता का ऐसा सुक्ष्म पेहेलू जो विज्ञान समझ नहीं सकता, और मुझे वह आकर्षक लगा.
इस मे से किसी का भी मेरे जीवन मै व्यावहारिक प्रयोग करने की मुझे उम्मीद नहीं थी. लेकिन दस साल बाद, जब हम पहली Macintosh कंप्यूटर बना रहे थे, यह सब मुझे याद आया. और हमने इसे मैक के डिजाइन मै इस्तेमाल किया. सुंदर अक्षर रचना वाला वह पहला संगणक था. अगर मैंने मेंरे महाविद्यालय का वह एक विषय नहीं पढा होता, तो Mac संगणक मै विविध अक्शर रचना और समांतर अक्षर रचना की प्रणाली कभी नही होती. और Windows ने Mac की सिर्फ नकल की, इस लिये कोई और व्यक्तिगत कंप्यूटर मै वह होने कोई संभावना नही. अगर मैं कभी महाविद्यालय नही छोडता, तो मैं कभी सुलेखन कक्षा में नही जाता, और शायद व्यक्तिगत कंप्यूटर्स मै सुंदर अक्शर रचना का प्रयोग नहीं होता, जो अब हो रहा है. बेशक जब मैं महाविद्यालय में था, तब भविष्य में देख के यह बिंदुओंको संलग्न करना असंभव था. लेकिन दस साल बाद भुतकाल में देखते समय यह बहुत ही साफ नझर आया.
फिर भी, तुम भविष्य में देख के बिंदुओंको संलग्न नहीं कर सकते, तुम सिर्फ उन्हें भूतकाल में देख कर संलग्न कर सकते हो. इसी लिए तुम्हे विश्वास रखना है कि किसी तरह यह बिंदु तुम्हारे भविष्य में संलग्न हो जायेंगे. तुम्हे कुछ चिजों में विश्वास करना होगा – अपनी संभावना, भाग्य, जीवन, कर्म, जो भी हो. यह दृष्टिकोण ने हमेशा मेरा साथ दिया है, और इसी ने मेरे जीवन को अलग बनाया है.
मेरी दूसरी कहानी है प्यार और नुकसान के बारे में.
मैं भाग्यशाली था – मुझे जो करना पसंद था वह मुझे जीवन में बहुत पेहले मिला. जब मैं २० वर्ष का था, Woz और मैंने मेरे माता पिता के गैरेज में Apple शुरू की. हमने बहुत मेहनत की, और 10 साल में एप्पल एक गैरेज में हम दोनों से लेके, एक 2 अरब डॉलर की 4000 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनी हो गई थी. हमने सिर्फ एक साल पहले हमारी बेहतरीन रचना – Macintosh – जारी की थी, और मैं तभी 30 साल का हुआ था, और फिर मुझे निकाल दिया गया. जो कंपनी तुमने शुरू की है, उस कंपनी से तुम कैसे एक निकाले जा सकते हो? खैर, जैसे एप्पल बढ़ी हमने किसी ऐसे को काम पर रखा जो मैंने सोचा था कि मेरे साथ कंपनी को चलाने के लिए बहुत प्रतिभाशाली था, और लगबग पहले वर्ष के लिए तो सबकुछ अच्छा रहा. लेकिन फिर भविष्य की हमारी दृष्टि अलग होने लगी और अंततः हम में झगडा हो गया. जब हम में झगडा हुआ, हमारे निदेशक मंडल ने उसका पक्ष लिया. ऐसे 30 साल कि उम्र में मै बाहर निकाला गया था. और बहुत ही सार्वजनिक रूप से बाहर निकाला गया था. जिस पे मेरे पूरे वयस्क जीवन का ध्यान केंद्रित था वह चला गया था, और यह विनाशकारी था.
कुछ महीनों के लिए मुझे सच में नहीं पता था के मैने क्या करना चाहीये. मुझे लगा कि मैंने उद्योजकों की पिछली पीढ़ी को निराश किया था – कि जो छडी मुझे सौप दी गयी थी वह मैंने गिरा दी थी. मैं दैवीड पॅकार्ड और बॉब नोइस से मिला और मेरे इतने बुरे अपयश के लिए माफी माँगी. मेरा अपयश एक बहुत ही सार्वजनिक विफलता थी, और मैंने तो वैली से भागने का भी विचार किया था. लेकिन कुछ बातें धीरे धीरे मुझे समझने लगी – मैने जो काम किया था उस से मुझे अभी भी लगाव था.एपल में हुई घटनाओं से वह एक बात नहीं बदली थी. मुझे अस्वीकार किया था, लेकिन मैं अभी भी उसी बात से प्यार करता था. और इसलिए मैंने फिरसे शुरूवात करने का फैसला किया.
मैंने यह तो नहीं देखा था, लेकिन पता चला कि एप्पल से निकाल दिया जाना यह मेरे लिये सबसे अच्छी बात थी.नये काम के हलकेपन ने सफल होने के भारीपन की जगह ले ली थी, सभी चिजों की कम निश्चिती. इसने मुझे मेरे जीवन के सबसे रचनात्मक अवधि में प्रवेश करने के लिए मुक्त कर दिया.
अगले पांच वर्षों के दौरान, मैंने एक नैक्ट नाम की, एक और Pixar नामक कंपनी कंपनी शुरू की, और एक अलगही औरत से मुझे प्यार हो गया, जो मेरी पत्नी बन गयी. Pixar ने दुनिया की पहली कंप्यूटर एनिमेटेड फीचर फिल्म बनायी टॉय स्टोरी, और जो की अब दुनिया का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है. कुछ उल्लेखनीय घटनाओं की एक बारी में, एप्पल ने नैक्स्ट कंपनी को खरीद लिया, मैं लौट कर एप्पल में आया, और जो तंत्रद्यान हमने नैक्स्ट के लिये विकसित कीया था वह अब एप्पल के वर्तमान नवनिर्माण के प्रमुख स्थान में है. और लौरेन और मैंरा एक खुशहाल परिवार है.
मुझे पूरा यकीन है कि अगर मैं एप्पल से नहीं निकाल जाता, तो यह सब नहीं होता. वह भयानक चखने वाली दवा थी, लेकिन मुझे लगता है कि वह रोगी की जरूरत थी. कभी कभी जीवन एक ईंट से तुम्हारे सिर में चोट करता है. विश्वास मत खोना. मुझे विश्वास है कि केवल एक चीज ने मेरा साथ दिया, मैंने वही किया जो मुझे पसंद था.जो तुम्हे पसंद है वह तुमने खोजना चाहिये. और यह बात जितनी तुम्हारे प्रेमियों के लिये सच है उतनिही तुम्हारे काम के लिए भी सच है. तुम्हारा काम तुम्हारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा है, और संतुष्ट होने का एकमात्र तरीका है वोही काम करो जो तुम्हे महान लगे. और महान काम करने का एक ही तरीका हैं, तुम्हारे काम से तुम्हे प्यार हो. अगर आप को अभी तक वह नहीं मिला है, तो खोजते रहो. स्वस्थ मत रहो. जैसे दिल के सभी मामलों में होता है, जब तुम्हे वह मिलेगा तुम्हे पता चल जाएगा. और, किसी भी अच्छे रिश्ते की तरह, जैसे साल गुजरते है, यह सिर्फ बेहतर और बेहतर होता जाता है. इसी लिए जब तक वह ना मिले ढुंडते रहना.स्वस्थ ना रहो.
मेरी तीसरी कहानी है मौत के बारे में.
जब मैं १७ साल का था, मैंने एक उद्धरण पढा, वह कुछ ऐसा था: “अगर तुम जिंदगी का हर दिन ऐसे जिते हो जैसे वह आखरी दिन है, तो कभी तो वह सच होगा”. यह विचार मुझ पर छा गया, और तब से पिछले ३३ वर्षों से, हर सुबह मैने खुद को आईने में देखा है और अपने आप से पूछा है: “अगर आज मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होता, तो क्या मैं वही करता जो मै आज करने वाला हुं?” और जब भी एक साथ कई दिनों तक जवाब आया “नहीं”, मुझे पता है की मुझे कुछ बदलने की जरूरत है.
याद रखना कि मैं जल्द ही मर जाने वाला ,हुं यह मुझे मिला हुआ सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है जो जीवन के बड़े पर्यायो में से चुनने के लिये मेरी मदद करता है. क्योंकि लगभग सब कुछ – बाहरी उम्मीदें, सभी गर्व, हार या शर्म का डर – ये बातें मौत के सामने कोई मायने नही रखती, जो असल में महत्वपूर्ण है केवल वही रहता है.तुम कुछ खोने वाले हो यह सोच की जाल से बचने का सबसे अच्छा तरीका है यह याद रखना कि तुम मरने वाले हो. तुम पहले से ही नग्न हो. कोई कारण नहीं है जिसके लिए तुम अपने दिल की ना सुनो.
लगभग एक साल पहले मुझे कैंसर का निदान किया गया था. मुझे सुबह ७:३० बजे स्कैन किया था, और उसमे स्पष्ट रूप से मेरे अग्न्याशय पर एक ट्यूमर दिखा. मुझे तो पता ही नहीं था की अग्न्याशय क्या था. डॉक्टरों ने मुझे लगभग निश्चित रूप से बताया की यह एक प्रकार का लाइलाज कैंसर है, और यह कि मैंने अब तीन से छह महीनों से ज्यादा जिवीत रेहने की उम्मीद नही करनी चाहिए. मेरे डॉक्टर ने मुझे घर जाने की और अपने मामलों की व्यवस्था करने की सलाह दी, जो की मरने के लिए तैयार होने का डॉक्टर का निर्देश है.मतलब अपने बच्चों को वह सब कुछ ही महीनों में बताने की कोशिश करना जो बताने के लिये तुम्हारे पास अगले १० साल है ऐसा तुमने सोचा था.मतलब यह निश्चित करना की सब कुछ व्यवस्थित है, ताकी तुम्हारे परिवार के लिए यह जितना संभव है उतना आसान हो.मतलब आपने अलविदा कहना.
मैने उस निदान के साथ सारा दिन गुजारा. बाद में उस शाम मुझ पे बायोप्सी की गयी, जहां उन्होने मेरे गले के माध्यम से मेरे पेट में ओर मेरी आंतों में endoscope डाला, मेरे अग्न्याशय में एक सुई डाली और ट्यूमर की कोशिकाओं को निकाला. मैं बेहोश था, लेकिन मेरी पत्नी ने, जो वहाँ थी, मुझे बताया कि जब उन्होनें एक खुर्दबीन के नीचे कोशिकाओं को देखा, तब डॉक्टर रोने लगे क्योंकि यह निष्पन्न निकला था कि वह अग्नाशय का दुर्लभ कैंसर था जो की सर्जरी से ठीक हो सकता है. मैंरी सर्जरी की गयी और मैं अब ठीक हूँ.
यह मेरा मौत से सबसे निकटतम सामना था, और मेरी उम्मीद है की अगले कुछ और दशकों के लिए यह सबसे निकटतम हो. पेहले मृत्यु एक उपयोगी परंतु केवल बौद्धिक संकल्पना था, इस अनुभव से गुजरने के बाद, अब मै आपको यह थोड़ी अधिक निश्चितता से कह सकता हुं:
कोई मरना नहीं चाहता. यहां तक कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं कि वह भी वहां जाने के लिए मरना नहीं चाहते. और फिर भी मृत्यु ही हम सब का अंतिम गंतव्य स्थान है. कोई भी इस से बचा नही है. और वह इसी रूप में रेहना चाहिए, क्योंकि मृत्यु जीवन का संभावित सर्वोत्क्रुष्ट आविष्कार है. यह जीवन का परिवर्तन कर्ता है. यह पुराने को साफ कर के नए के लिए रास्ता बनाता हैं. इस वक्त तुम नये हो, लेकिन किसी दिन जो बहुत दुर नहीं है, आप धीरे धीरे पुराने हो जाओगे और दूर किये जाओगे. काव्यात्मक होने के लिये क्षमा करें, लेकिन यह एक सत्य है.
तुम्हारा समय सीमित है, इस लिये किसी और का जीवन जीने में वह बर्बाद मत करो. हठधर्मिता में मत फसो – जो की दूसरे लोगों की सोच के परिणाम के साथ रहने की तरह है. दूसरों के विचारों के शोर में अपनी खुद की अंदर की आवाज मत डूबने देना. और सबसे महत्वपूर्ण, अपने दिल और अंतर्ज्ञान का उपयोग करने का साहस करो. वे किसी तरह पहले से ही जानते है की तुम सच में क्या बनना चाहते हो. बाकी सब गौण है.
जब मैं छोटा था, तब एक अद्भुत प्रकाशन था दि होल अर्थ कैटलॉग जो मेरि पिढि का बैबल था. वह एक स्ट्युवर्ट ब्रांड नाम के आदमी ने लिखा था, यहां से ज्यादा दूर नहीं, यहीं Menlo पार्क में, और उसने अपने काव्यात्मक स्पर्श से इसे ताझा किया था. यह अंतीम १९६० दशक की बात है, पर्सनल कंप्यूटर और डेस्कटॉप प्रकाशन से पहले की, तो यह सब टाइपराइटर, कैंची, और पोलोराइड कैमरों के साथ बनाया गया था. यह जैसे गूगल किताब के रूप में था, गूगल के आने के ३५ साल पहले: यह आदर्शवादी था, और स्वच्छ उपकरण और महान विचारों के साथ भरा हुआ था.
स्ट्युवर्ट और उनकी मंडलिओंने दि होल अर्थ कैटलॉग के कई प्रकाशन निकाले, और फिर जब वह अपने पाठ्यक्रम से चलाने लागा, उन्होने एक अंतिम प्रकाशन निकाला. वह १९७० के दशक के मध्य में था, और मैं तुम्हारी उम्र का था. पर उनके अंतिम प्रकाशन के पीछले प्रुष्ठ पर सुबह के वक्त के गांव के सड़क की एक तस्वीर थी, ऐसी सडक जिसपे आप किसी और से सवारी मांग सकते हो, अगर तुम ऐसी सडक पे चलने का साहस करो तो. उसके नीचे यह शब्द थे: “भूखे रहो. मूर्ख रहो.” यह उनकी विदाई का संदेश था जब उन्होने काम बंद कीया. भूखे रहो. मूर्ख रहो. और मैंने हमेशा इस की खुद के लिए लिये कामना की है. और अब जब आप स्नातक के रूप में नयी शुरूवात करेंगे, मैंरी तुम्हारे लिए यही इच्छा है.
भूखे रहो. मूर्ख रहो.
आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद.
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P S: The Marathi translation has started here: http://www.dubzer.com/read?a=1053
Launch one in your own language and let us know so we can help finish it!
Recently, I met several folks who quit pursuing their dream because a time bomb exploded in their minds. The time bomb had started ticking the very moment they announced, “In six months, if I haven’t reached some visible and socially acceptable milestone, I will quit my dream”. My personal experiences as well as those of my immediate circle show that such time bombs almost always explode. After reflecting on why they explode, I realized that they were setup to explode from the word go. They are plugged into a goal or a metric that was unrealistic and sometimes just incorrect for the chosen dream. So the clock always wins before you make it.
Far too many times I have measured progress on a scale that was bound to give a zero reading in the short-term. For example, if you are on a path of innovation, for creating an idea or a business mode that does not exist – how can you measure yourself by metrics used by a traditional business? You need to start with a well-proven business model to match business metrics. When you’re in a Laboratory mode you’re not a business in those early years; you’re simply validating if a business is possible when the product succeeds. Therefore it makes sense to measure your progress by the metrics used in a Lab. For example, how many experiments did you run, what did you learn from the ones that failed, how can you simplify the problem, etc. You need to talk to people who fund experiments and believe in iterative product evolution. If you choose the wrong scale, you chase the wrong milestones, and invariably set a time-bomb that’s bound to explode before you’re ready. You never gave yourself a fair chance.
If you want to be a successful writer, you cannot worry about publishing your first book the day you start writing. You will need to throw away many stories until you find the one that sticks. As Malcomn Gladwell’s book Outliers emphasizes that people need to put in 10,000 hours to become good at anything. Who is going to pay for those 10,000 hours of unstructured work? One cannot escape investing time. Unfortunately most of us find interesting stuff to do only later in life. The only problem with a late start is that it creates a pressure to apply past-income metrics i.e. the infamous opportunity cost to any time we spend on it, even before we have acquired the necessary learning to succeed.
In college, when the family was paying for learning, when a college was churning out a report card every six months for others to see, and when a degree was being promised four years later, we did not apply the time bomb principle. We let it take four years as there was no perception of opportunity cost. We allowed the luxury of four years of learning time to a degree that simply brings us at par with millions of others; and now we’re unable to give the same luxury to a goal that has the potential to make us stand out in that crowd!
Eyes cannot see progress, they only see results. So what do you show them when you have no visible results? Go get someone who can see the invisible, who can see the small progress you’ve made and can nudge you forward – a mentor, a patron, a companion, or a real angel. That person will take you through that period of invisible progress.
Our society creates a pattern of setting time bombs to everything we do – buying a house, a new car, or even irreversible events like getting married and having children are all attached to a fixed time-line. We should all learn to reserve time bombs for things that are less important, like doing laundry before the weekend is over or learning to play a song before the year is over. When it comes to stuff that matters to feeling alive; stuff you never want to see explode, like your childhood dream, or a compelling vision, or a meaningful relationship. Let it have all the time it needs. Just find a way to keep it ticking. Even if it’s behind time, it’s alive!
~ Anjali
Well the authors on Sukshma, are still writing to the rest of the web – only difference is we’re using micro-blogs on twitter.com (you can find Anjali here and Santosh here).
I hope to blog here more often with a renewed focus on entrepreneurship.
If I were to do a startup all over again (and I am right now), I would aim not to survive but to grow. At least that is how I see the dilemma at this time.
This piece of news is exciting enough to merit a blog post.
This year, at least one wireless phone company in the United States will probably offer netbooks free with paid data plans, copying similar programs in Japan, according to industry experts.
But this revolution is not just about falling prices. Personal computers — and the companies that make their crucial components — are about to go through their biggest upheaval since the rise of the laptop. By the end of the year, consumers are likely to see laptops the size of thin paperback books that can run all day on a single charge and are equipped with touch screens or slide-out keyboards.
How long before we have the intersection of 3G and Netbooks in India? I see this as a positive trend for Web services and the Internet economy.
When I heard the ex-CEO of TeamOn, a Startup I had worked with, was due to quit his position at Research in Motion and start out on his next venture, I sensed an opportunity to learn more about the early days in a Startup. Shirish happened to be with the same RIM office as I did; I went up to him to let him know that I too planned to quit to start a venture out of India. Read more…
